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Sunday, January 31, 2016

बापू, ढ़ूँढ़ ही लो तुम कोई नया भारत!

महात्मा गांधी के प्रति, एक राष्ट्र के तौर पर हमारी उपेक्षा अब पूरी तौर पर कृतघ्नता में बदल चुकी है, ऐसा मुझे लगता है.  3० जनवरी 1948 को उनकी हत्या के बाद साल दर साल उनके विचारों की भी हत्या होती रही हैं अभी कल, बापू की पुण्य तिथि पर, ख़बर है कि कुछ युवकों ने सार्वजनिक सभा कर के खुशी का इजहार किया, मिठाईयां बांटी वगैरह. सोशल मीडिया में गोडसे के बरसों पुराने अपराध को खुले तौर पर एक वीरोचित कदम ठहराने की बातें होती रही. मुझे सन् 1991 की एक ऐसी ही ख़बर याद हो आयी जब बापू की समाधि पर कुछ युवकों ने तोड़-फ़ोड़ की थी और मैंने बहुत क्षुब्ध हो कर एक कविता जैसा कुछ लिखने का प्रयत्न किया था. आज एक बार फिर मुझे वैसा ही महसूस हुआ है और उस ''कविता जैसे कुछ'' को मैं यहां साझा कर रहा हूं.
      
बापू,
कर चुके उद्धार का प्रण पूरा तुम?
ओढ़ा चुके ममता की चादर सर्वजन पर?
बस!
अब निर्रथक हो तुम
इस धरा के लिये मिथ्या, मिथक हो तुम!|
जाओ, और ढ़ूँढ़ो कोई नया भारत
जहां-
चिरनिद्रा तो तुम्हारी पूजनीय हो,
अगर था जीवन संघर्षरत |
ना, हम यहां सोने नहीं देंगे तुम्हें!
कलुषित राजनीति की आवाज़ें हैं अब हमारा मंगल गान,
तांडव करता है हमारे ह्रदयों मे
वैमनस्य,
और भावनाओं का अपमान |
श्रद्धा-सुमन, जो थे तुम्हारे लिये,
कुचल डालेंगे हमारे मदांध कदमों में
बस. . . अब ना बोलो, ना मुस्कुराओ !
हम नहीं चाहते कि,
विष-वृक्ष जो सींचा है हमने,
राख़ हो जाये तुम्हारी निश्चल मुस्कुराहट से;
हम नहीं चाहते कि,
हमारे नेत्रों को ढ़क सकने वाला अज्ञान का पर्दा
हटा पायें तुम्हारे हाथ;
हम घूमना चाहते हैं अभी भी,
लहू से रंगे, एक दूसरे के;
हम विचरना चाहते हैं अभी भी,
छिछली मानसिकता के जंगलों में;
तुम्हारी यह उजली सोच,
नहीं रह सकती अब,
हमारी कालिख़ पुती कोठरी में !
फिर दाग़ देंगीं तुम्हें , हम - यह तुम्हारी संतानें!
इसलिये बापू,
अब ढ़ूंढ़ लो कोई नया भारत
हां, अब ढ़ूंढ़ ही लो कोई नया भारत   

Tuesday, May 29, 2012

Hit Morning with Sarthak

I was recently at the Delhi studios of Hit 95FM radio to participate in a live game-show with their star RJ Sarthak.
" Hit Mornings" is their morning show which I listen to regularly, and it is because I love listening to Sarthak and really respect him for his skills.
Oratory skills are of course a given in an RJ. Still, I rarely find people these days equally proficient in Hindi and English. Not only proficient, but respectful towards both the languages. Oh, how I cringe when I listen to grammatically bad English and even worse Hindi, spoken almost contemptuously.
And then, his decency and respect towards the listeners. His treatment of the phone-in listeners (incidentally, Hit 95FM has an impressive listener participation) shows it is not necessary to be irreverent and crass if you want to have fun.
But a voice is, after all, a voice. So I was frankly a bit apprehensive before meeting the person behind it. To my pleasant surprise, however, I was not at all disappointed. He is as graceful and decent as he sounds over the radio. During the time we were together inside the studio, he made us (me and my son Yash) comfortable, and at the end, he generously came out and saw us off at the elevators. And of course we were shown that famous Chinese Bhompoo, the ghanti et al. A thoroughly pleasant experience it was. Sarthak is entitled to a little more than "ghamand".
While thanking Sarthak and wishing him all the very best, I share with you a couple of photos:


Sunday, May 06, 2012

The Power to Question - Milan Kundera

Its been almost 3 months since I last put up a post here. This unplanned interlude has not been entirely  unwelcome, because lately the blog was turning in to a sort of film review portal only. Even though I love films, "और भी ग़म हैं ज़माने में......", as Chacha Ghalib would say. 
The well-read among you would know Milan Kundera as the noted Czech novelist who writes on politics, history and human relations. I have been introduced to this genius quite late in life, courtesy a fulsome recommendation and priming by my friend Rahul J. 
I have recently finished reading his "Immortality", published in 1991, and find it akin to a detailed travelogue on a journey in to one's mind, something like watching self from afar. Here is something which I found pertinent to share with you in these times when we are questioning the role of media:


"Journalists realized that posing questions was not merely a practical working method for the reporter modestly gathering information with notebook and pencil in hand; it was a means of exerting power. The journalist is not merely the one who asks questions but the one who has a sacred right to ask, to ask anyone about anything. But don't we all have that right? And it is a question not a bridge of understanding reaching out from one human being to another? Perhaps. I will therefore make my statement more precise: the power of the journalist is not based on his right to ask but on his right to demand an answer.


Please note carefully that Moses dis not include among God's Ten Commandments: 'Thou shalt not lie!' That's no accident! Because the one who says, 'Don't lie!' has first to say, 'Answer!' and God did not give anyone the right to demand an answer from others. 'Don't lie!' 'Tell the truth!' are words which we must never say to another person in so far as we consider him our equal. Perhaps God only has the right but He has no reason to resort to it since He knows everything and does not need to know our answers.

The inequality between one who gives orders and one who must obey is not as radical as that between one who has a right to demand an answer and one who has the duty to answer. That is why the right to demand answers has, since time immemorial, only been accorded in exceptional circumstances. For example, to a judge inquiring in to a crime. In our century, fascists and communists states have appropriated this right, not only in exceptional circumstances but permanently....

The election campaign is on, the politician jumps from plane to helicopter, from helicopter to car, exerts himself, perspires, bolts his lunch on the run, shouts into microphones, makes two hour speeches, but in the end it will depend on Bernstein or Woodward which of the fifty thousand sentences that he uttered will be released to the newspapers or quoted on the radio.That's why the politician would prefer to address the radio or TV audience directly, but this can only be accomplished through the meditation of an Oriana Fallaci, who sets the media rules and asks the questions. The politician will want to exploit the moment when he is finally seen by the entire nation, and to say everything that's on his mind, but Woodward will ask him only about things that aren't on the politician's mind at all and that he has no desire to talk about. He will thus find himself in the classic situation of a schoolboy called to the blackboard, and will try to use  the old schoolboy trick: he will pretend to be answering the question, but in reality will use the material he has specially prepared at home for the broadcast. This trick may have worked on his teachers but it does not work on Bernstein, who keeps reminding him mercilessly: 'You haven't answered my question!'

Tuesday, November 01, 2011

राग दरबारी - श्रीलाल शुक्ल जी की कालजयी रचना (Raag Darbari - Shreelal Shukla)

हिंदी लेखकों में संभवत: सबसे करारे व्यंगकार श्रीलाल शुक्ल जी नहीं रहे | उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धान्जलि| 
शुक्ल जी के लेखन से मेरा परिचय उनकी सर्वाधिक प्रसिद्द और साहित्य अकादमी पुरुस्कृत कृति "राग दरबारी" से हुआ | मेरे लड़कपन में दूरदर्शन पर आने वाले इसी नाम के सीरियल को देख कर मैं इस किताब तक पहुंचा था |    
जैसा मैंने पहले  भी कहा है, "राग-दरबारी" न केवल भारत की गाय-पट्टी में बिखरे असंख्य कस्बों और गावों का एक अनिवार्य प्राईमर है बल्कि व्यंग्य की शक्ल में हमारे तंत्र की विफलताओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है | 
शिवपाल-गंज नामक एक काल्पनिक क़स्बे में स्थित यह गाथा छोटे कस्बों और गावों की सामाजिक और  राजनैतिक हालत पर तीखा किन्तु सोद्देश्य व्यंगय करती है, और सत्तर के दशक में लिखी जाने के बावजूद यह कमोबेश आज भी प्रासंगिक है |स्वयं लेखक के शब्दों में - " जैसे जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में ग़बन, धोखा-धड़ी,  भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़ें मज़बूत करता जाता है, वैसे वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास और भी प्रासंगिक होता जा रहा है"  |   
इस किताब की मारक क्षमता से आपका परिचय करवाने के उद्देश्य इसी पुस्तक से मैं एक छोटा अंश मैं उद्धत कर रहा हूँ | आप में से जिन्होंने भी दिल्ली के अत्याधुनिक टी-3 हवाई अड्डे के अलावा कस्बाई बस अड्डों पर भी विचरण किया है, उन्हें यह बहुत पहचाना हुआ लगेगा | मेरी मानिये, किताब तुरंत उठाइए |          


हमारे न्याय-शास्त्र की किताबों में लिखा है की जहाँ-जहाँ धुआं होता है, वहां-वहां आग भी होती है | वहीँ यह भी बढ़ा देना चाहिए कि जहाँ बस का अड्डा होता है, वहां गन्दगी होती है |
शिवपालगंज के बस-अड्डे की गन्दगी बड़ी नियोजित ढंग की थी |
गन्दगी-प्रसार योजना को आगे बढाने वाले कुछ प्राकृतिक साधन वहां पहले ही से मौजूद थे. अड्डे के पीछे एक समुद्र था, यानी कम-स-कम एक झील थी जो बरसात में समुद्र-सी दिखती थी | दरअसल यह झील भी नहीं थी, जाड़ों में वह झील थी, बाद में वह एक छोटा-सा पोखर बन जाती थी | गन्दगी की सप्लाई का वह एक नैसर्गिक साधन था | शाम-सवेरे वह जनता को खुली हवा देता था और खुली हवा के शौचालय की हैसियत से भी इस्तेमाल होता था | सुबह होते ही 'शर्मदार के लिए सींक की आड़ काफी होती है', इस सिद्धांत पर वहां उगने वाले हर तिनके के पीछे एक-एक शर्मदार आदमी छुपा हुआ नज़र आता था, बहुत से ऐसे भी लोग थे जो 'भाइयों और बहनों, मेरे पास  छिपाने को कुछ नहीं है' वाली सच्चाई से बिलकुल खुले में बैठ कर और सींक की आड़ भी न ले कर, अपने आपको पेश करने लगते थे | इस मौके से फ़ायदा उठाने के लिए शिवपालगंज के सभी पालतू सूअर सवेरे-सवेरे उधर ही पहुँच जाते थे | वे आदमियों द्वारा पैदा की हुई गन्दगी को आत्मसात  करते, उसे इधर-उधर छितराते और वहां की हवा को बदबू से बोझिल बनाने की कोशिश करते | पोखर के ऊपर से उड़ कर कसबे की ओर आनेवाली हवा - जिसका कभी भवभूति ने 'वीचीवातै:, शीकरच्छोदशीतै:' के रूप में अनुभव किया होगा - बस के अड्डे पर बैठे हुए मुसाफिरों को नाक पर कपडा लगाये रहने पर मजबूर कर देती थी | गाँव-सुधार के धुरंधर विद्वान् उधर शहर में बैठ कर "गाँव में शौचालय की समस्या" पर गहन विचार कर रहे थे और वास्तव में 1937 से अब तक विचार-ही-विचार करते आ रहे थे, इधर बस के अड्डे पर बैठे हुए मुसाफ़िर नाक पर कपड़ा लपेट कर कभी जैन-धर्म स्वीकार करने को तैयार दिखते, कभी सूअरों की गुरगुराहट सुनते हुए वाराह-अवतार की कल्पना में खो जाते | वातावरण बदबू और धार्मिक संभावनाओं से भरा-पूरा था |
सूअरों के झुण्ड सड़क पर निकलते समय आदमियों की नक़ल करते | वे दायें-बाएँ चलने का ख्याल न करके सड़क पर निकलने वाली हर सवारी के ठीक आगे चलते हुए नज़र आते और आपसी ठेल-ठाल में कॉलिज के लड़कों को भी मात देते | बस के अड्डे की चहारदीवारी एक जगह पर टूट गयी थी | इसका फ़ायदा उठा कर वे सड़क से सीधे बस के अड्डे में घुसते और दूसरी ओर फाटक से निकल कर पोखर के किनारे पहुँच जाते | उनके वहां पहुंचते ही पिकनिक और यूथ - फ़ेस्टिवल का समाँ बंध जाता | 
गन्दगी-प्रसार-योजना के अंतर्गत वहां पर बस का अड्डा बनाते समय इन प्रकुर्तिक सुविधाओं का ध्यान रखा गया होगा | वैसे, गन्दगी सप्लाई करने की दूसरी एजेंसियाँ भी वहां पहले से मौजूद थी | उनमें एक ओर मंदिर था जो अपनी चीकट सीढ़ीयों के कारण मक्खी-पालन का बहुत बड़ा केंद्र बन गया था | उसके चारों ओर छितरे हुए बासी फूल, मिठाई के दोने और मिट्टी के टूटे-फूटे सिकोरे चीटियों को भी आकर्षित करते थे | दूसरी ओर एक धर्मशाला थी जिसके पिछवाड़े हमेशा यह संदेह होता था कि यहाँ पेशाब का महासागर सूख रहा है |
गंदगी के इन कार्यक्रमों में ठीक से ताल-मेल बैठाकर छोटी-मोटी कमियों को दूसरी तरकीबों से पूरा किया गया था | उनमें सबसे प्रमुख स्थान थूक का था जिसे हर जगह देखते रहने के कारण राष्ट्रीय चिह्न मान लेने की तबियत करती है | हमारी योजनाओं में जैसे काग़ज़, वैसे ही हमारी गंदगी का महत्वपूर्ण तत्व थूक है | थूक उत्पादन में वहां पान की दस-बीस दुकानें, कुछ स्थिर और कुछ गश्ती - प्राइवेट सेक्टर की सरकारी मान्यता प्राप्त फैक्ट्रीयों की तरह काम करती थीं | थूक का उत्पादन जोर पर था | थूक फ़ैलाने के लिए चारों तरफ कई पात्र ज़मीन में गाड़ दिए गए थे जिनको देखते ही आदमी किसी भी दिशा में - उर्ध्व दिशा को छोड़ कर - थूक देता था और वह इस खूबी से थूकता था कि सारा थूक पात्र के बाहर ही जा कर गिरे | नतीजा यह था कि चारों ओर चार फुट की ऊंचाई तक दीवारों पर, और कहीं फ़र्श पर, थूक की नदियाँ कुछ-कुछ उसी तरह बहती थीं, जैसे सुनते हैं, कभी यहाँ घी-दूध की नदियाँ बहा करती थीं | 
फिर लुढ़कते और रिरियाते हुए भिखमंगे, जो संख्या में बहुत कम होने पर भी अपनी लगन के कारण चारों तरफ एक-साथ दिखाई देते | चाय की दुकानों पर चाय की सड़ी, चुसी हुई पत्तियाँ और गंदे पानी के नाब-दान | आने और जाने वाली बसों की गर्द | मरियल कुत्तों की आरामगाहें | और गंदगी - प्रसार योजना को सबसे बड़ा प्रोत्साहन देने वाली अखिल भारतीय संस्था - मिठाई और पूड़ी की दुकानें, हलवाईयों की तोंद, उनके छोकडों की पोशाक |    

Saturday, September 24, 2011

RIP Tiger Pataudi

I have dipped in to my old, school-time scrap book to pull out this extract from an old issue of Sportsworld, which in turn quotes from “Face to Face with a Tiger” from “The Illustrated Weekly of India of May 1986. This small piece beautifully captures Tiger’s stamp of style on Indian cricket. Regret I do not have the author’s name:


"If you’ve got a moment, try this experiment.  Take a ball, close one eye, toss it up and try catching it. The chances are you will miss. Because with one eye you will have what is known as a “parallax” problem. 
Now imagine facing Jeff Thomson, John Snow, Fred Trueman or even Lance Gibbs with one eye. Or imagine taking a hot, low catch. And imagine doing all that with style, power and international class. Hard to imagine an ordinary human being doing that. But what about a Tiger? Or Mansur Ali Khan – the Nawab of Pataudi? Ah! Now that’s possible, isn’t it?
Within the first two minutes of meeting him, you’ll know Tiger’s no pussy cat. He stalks in to his lair - a brown, dark den loaded with books and a few photographs - and fixes you with a steady, unblinking gaze. His agile mind ripples with tough opinions and he expresses them with a tigerish conviction. Mansur Ali Khan is every inch his epithet – Tiger.

Sunday, March 13, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 3 (Last)


भाग -३ (अंतिम)
वर्ण व्यवस्था पर ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) का उद्धरण  


"वर्ण का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन सम्बन्ध निर्मित हो गया. हो जाने के पीछे बहुत कारण हैं, वह मैं बात करूंगा. हो जाने के पीछे कारण थे, वैज्ञानिक ही कारण थे. सम्बन्ध नहीं था जन्म के साथ वर्ण का, इस लिए फ़्लुइडिटि थी, और कोई विश्वामित्र यहाँ से वहां हो भी जाता था. संभावना थी कि एक वर्ण से दूसरे वर्ण में यात्रा हो जाये. लेकिन जैसे ही यह सिद्धांत खयाल में आ गया और इस सिद्धांत की परम वैज्ञानिकता सिद्ध हो गयी कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण से, अपने ही स्वधर्म से ही सत्य को उपलब्ध हो सकता है, तो एक बहुत जरूरी बात पैदा हो गयी और वह यह कि यह कैसे पता चले कि कौन व्यक्ति किस वर्ण का है. अगर जन्म से तय न हो, तो शायद ऐसा भी हो सकता है कि एक आदमी जीवन भर कोशिश करे और पता ही ना लग पाए कि किस वर्ण का है; उसका क्या है झुकाव, वह क्या होने को पैदा हुआ है - पता ही कैसे चले? तो फिर सुगम यह हो सकता है कि अगर जन्म से कुछ निश्चय किया जा सके. 

लेकिन जन्म से कैसे निश्चय किया जा सके? कोई आदमी किसी के घर में पैदा हो गया, इस से तय हो जायेगा? कोई आदमी किसी के घर पैदा हो गया, ब्राह्मण के घर में, तो ब्राह्मण हो जाएगा?

जरूरी नहीं है. लेकिन बहुत संभावना है. प्रोबबिलीटी ज्यादा है. और उस प्रोबबिलीटी को बढाने के लिए, सर्टन करने के लिए बहुत से प्रयोग किये गए. बड़े से बड़ा प्रयोग यह था कि ब्राह्मण को एक सुनिश्चित जीवन व्यवस्था दी गयी, एक डिसिप्लिन दी गयी.........लेकिन दो जातियों में शादी न हो, उसका कारण बहुत दूसरा था. उसका कुल कारण इतना था कि हम प्रत्येक वर्ण को एक स्पष्ट फॉर्म, एक रूप दे देना चाहते थे....

इन चार हिस्सों में जो स्ट्राटीफिकेशन किया गया समाज का, चार हिस्सों में तोड़ दिया गया, ये चार हिस्से ऊपर-नीचे की धारणा से बहुत बाद में भरे. पहले तो एक बहुत वैज्ञानिक, एक बहुत मनोवैज्ञानिक प्रयोग था जो इनके बीच किया गया. ताकि आदमी पहचान सके कि उसके जीवन का मौलिक पैशन, उसके जीवन की मौलिक वासना क्या है......

मूल्य रुपये में नहीं होता. मूल्य व्यक्ति के वर्ण में होता है. उस से रुपये में आता है. अगर वैश्य के हाथ में रूपया आ जाए तो उस में मूल्य होता है, क्षत्रिय के हाथ में रुपये का मूल्य इतना ही होता है कि तलवार खरीद ले, इस से ज्यादा मूल्य नहीं होता, इनट्रीनसिक वैल्यू नहीं होती रुपये की क्षत्रिय के हाथ में; हाँ एक्सटर्नल वैल्यू हो सकती है कि तलवार खरीद ले.

इति.

इसी क्रम में - 

            

Saturday, March 12, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 2

भाग -२
वर्ण व्यवस्था पर ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) का उद्धरण  

"लेकिन नीत्से किसी एक वर्ग के लिए ठीक-ठीक बात कह रहा है. किसी के लिए तारों में कोई अर्थ नहीं होता. किसी के लिए एक ही अर्थ होता है, एक ही संकल्प होता है कि शक्ति और उर्जा के उपरी शिखर पर कैसे उठ जाए. उसे हमने कहा था क्षत्रिय.....

चित्र "द लास्ट मुग़ल" से  
तीसरा एक वर्ग और है, जिसको तलवार में सिर्फ भय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ेगा; संगीत तो कभी नहीं, सिर्फ भय दिखाई पड़ेगा. जिसे ज्ञान की खोज नासमझी मालूम पड़ेगी कि सरफिरों का काम है. तो तीसरा वर्ग है, जिसके लिए धन महिमा है. जिसके लिए धन ही सब कुछ है. धन के आस पास ही जिसके जीवन की सारी व्यवस्था निर्मित होती है. अगर वैसे आदमी को मोक्ष की भी बात करनी हो तो उसके लिए मोक्ष भी धन के रूप में ही दिखाई पद सकता है. अगर वह भगवान् का भी चिंतन करेगा तो भगवन को लक्ष्मीनारायण बनाये बिना नहीं रह सकता. इसमें उसका कोई कसूर नहीं है. सिर्फ फैक्ट, सिर्फ तथ्य की बात कर रहा हूँ मैं. और ऐसा आदमी छिपाए अपने को, तो व्यर्थ ही कठिनाई में पड़ेगा. अगर वह दबाये अपने आपको तो कठिनाई में पड़ेगा. उसके लिए जीवन की जो परम अनुभूति का द्वार है, वह शायद धन की खोज से ही खुलने वाला है. इस लिए और कहीं से खुलने वाला नहीं है. 

अब एक रॉकफैलेर या एक मोर्गोन या एक टाटा, ये कोई छोटे लोग नहीं हैं. कोई कारण नहीं है इनके छोटे होने का. ये अपने वर्ग में वैसे ही श्रेष्ठ हैं जैसे कोई याज्ञवल्कय, जैसे कोई पतंजलि, जैसे कोई अर्जुन अपने वर्गों में होंगे. इस में कोई तुलना, कोई कम्पेरिज़न नहीं है.

वर्ग की जो धारणा है, वह तुलनात्मक नहीं है, वह सिर्फ तथ्यात्मक है. जिस दिन वर्ण की धारणा तुलनात्मक हुई, कि कौन ऊपर और कौन नीचे, उस दिन वर्ण की वैज्ञानिकता चली गयी और वर्ण एक सामजिक अनाचार बन गया. जिस दिन वर्ण में तुलना पैदा हुई - कि क्षत्रिय ऊपर, कि ब्राह्मण ऊपर, कि वैश्य ऊपर, कि शूद्र ऊपर, कि कौन नीचे, कि कौन पीछे - जिस दिन वर्ण का शोषण किया गया, वर्ण के वैज्ञानिक सिद्धांत को जिस दिन समाजिक शोषण की आधारशिला में रखा गया, उस दिन से वर्ण की धारणा अनाचार हो गयी. 

सभी सिद्धांतों का अनाचार हो सकता है, किसी भी सिद्धांत का शोषण हो सकता है. वर्ण की धारणा का भी शोषण हुआ. और इस मुल्क में जो वर्ण की धारणा के समर्थक हैं, वे उस वर्ण की वैज्ञानिकता के समर्थक नहीं हैं. उस वर्ण के आधार पर जो शोषण खड़ा है, उस के समर्थक हैं. उसकी वजह से वे तो डूबेंगे ही, वर्ण का एक बहुत वैज्ञानिक सिद्धांत भी डूब सकता है. 

चित्र अंतरजाल से 
एक चौथा वर्ग भी है, जिसे धन से भी प्रयोजन नहीं है, शक्ति से भी अर्थ नहीं है, लेकिन जिसका जीवन कहीं बहुत गहरे में सेवा और सर्विस के आस-पास घूमता है. जो अगर अपने आप को कहीं समर्पित कर पाए और किसी की सेवा कर पाए तो फुल्फिल्मेंट को, अप्ताता को उपलब्ध हो सकता है. 

ये जो चार वर्ग हैं, इनमें कोई नीचे ऊपर नहीं हैं. ऐसे चार मोटे विभाजन हैं. और कृष्ण की पूरी साइकोलोजी, कृष्ण का पूरा मनोविज्ञान इसी बात पर खड़ा है कि प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा तक पहुँचने का जो मार्ग है, वह उसके स्वधर्म से गुजरता है. स्वधर्म का मतलब हिन्दू नहीं, मुसलमान नहीं, जैन नहीं. स्वधर्म का मतलब, उस व्यक्ति का जो वर्ण है. और वर्ण का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन सम्बन्ध निर्मित हो गया. हो जाने के पीछे बहुत कारण हैं, वह मैं बात करूंगा." 

(आगे जारी...)   

इसी क्रम में - 
      

Friday, March 11, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 1

अभी किसी पत्रिका में पढ़ा कि आधुनिक भारत में दलित उत्थान के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तम्भ कांशीराम का जन्मदिन आगामी १५ मार्च को है. 
इस पर मुझे ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) के उस भाग की याद हो आयी जिस में उन्होंने वर्ण-व्यवस्था की वैज्ञानिकता पर चर्चा की है.   
जाति और वर्ण व्यवस्था के मसले पर कुछ कह पाने जितना  न तो मैं पढ़ा-लिखा हूँ, न मुझे बड़ा भारी सामाजिक अनुभव है पर यह निश्चित है कि मैं किसी भी सामाजिक अन्याय और असमता का पक्षधर नहीं हूँ.  यह भी मैं समझता हूँ कि यह एक ऐसा संवेदनशील विषय है जिस पर साधारणतया  खुल कर, बिना पूर्वाग्रहों के, निष्पक्ष बहस बहुत मुश्किल है.  पर इस सब के उपरांत इस प्रवचन के मूल भाव से मैं पूर्णतया:सहमत हूँ और इस लिए आपके साथ साझा करने की इच्छा रखता हूँ. 
आज प्रस्तुत है पहला भाग:  
          

हे अर्जुन.....
और धर्म को देख कर भी तू भय करने योग्य नहीं है,
क्यूंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़ कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य
क्षत्रिय के लिए नहीं है /(श्लोक ३१, श्री भगवद गीता) 
"कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि और सब बातें छोड़ भी दो, तो भी क्षत्रिय हो, और क्षत्रिय के लिए युद्ध से भागना श्रेयस्कर नहीं है 

इसे थोडा समझ लेना जरूरी है, कई कारणों से.
    
एक तो विगत पांच सौ वर्षों में , सभी मनुष्य सामान हैं, इसकी बात इतनी प्रचारित की गयी है कि कृष्ण की यह बात बहुत अजीब लगेगी, बहुत अजीब लगेगी, कि तुम क्षत्रिय हो. समाजवाद के जन्म के पहले, सारी पृथ्वी पर, उन सारे लोगों ने, जिन्होंने सोचा है और जीवन को जाना है, बिलकुल ही दूसरी उनकी धारणा थी. उनकी धारणा थी कि कोई भी व्यक्ति सामान नहीं है. एक.

और दूसरी धारणा उस असमानता से ही बंधी हुई थी और वह यह थी कि व्यक्तियों के टाइप हैं, व्यक्तियों के विभिन्न प्रकार हैं. बहुत मोटे में, इस देश के मनीषियों नें चार प्रकार बांटे हुए थे, वे चार वर्ण थे. 

(चित्र krishna.org से साभार)
वर्ग की धारणा भी बुरी तरह, बुरी तरह निन्दित हुई. इसलिए नहीं कि वर्ण की धारणा के पीछे कोई मनोवैज्ञानिक सत्य नहीं है, बल्कि इस लिए कि वर्ण की धारणा मानने वाले लोग अत्यंत नासमझ सिद्ध हुए. वर्ण की धारणा को प्रतिपादित जो आज लोग कर रहे हैं, अत्यंत प्रतिक्रियावादी और अवैज्ञानिक वर्ग के हैं. संग-साथ से सिद्धांत तक मुश्किल में पड़ जाते हैं... 

इन भिन्नताओं की अगर हम बहुत मोटी रूप-रेखा बांधें, तो इस मुल्क ने कृष्ण के समय तक बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य को विकसित कर लिया था और हमने चार वर्ण बांटे थे. चार वर्णों में राज है. और जहां भी कभी मनुष्यों को बांटा गया है, वह चार से कम में नहीं बांटा गया है और चार से ज्यादा में भी नहीं बांटा गया: जिन्होनें भी बांटा है - इस मुल्क में ही नहीं , इस मुल्क के बाहर भी. कुछ कारण दिखाई पड़ता है. कुछ प्राकृतिक तथ्य मालूम होता है पीछे.

ब्राह्मण से अर्थ है ऐसा व्यक्ति, जिसके प्राणों का सारा समर्पण बौद्धिक है, इंटेलेक्चुअल है. जिसके प्राणों की सारी ऊर्जा बुद्धि में रूपांतरित होती है. जिसके जीवन की सारी खोज ज्ञान की खोज है. उसे प्रेम न मिले, चलेगा; उसे धन न मिले, चलेगा; उसे पद न मिले, चलेगा; लेकिन सत्य क्या है, इस के लिए वह सब समर्पित कर सकता है. पद, धन, सुख, सब खो सकता है. बस, एक लालसा, उसके प्राणों की उर्जा एक ही लालसा के इर्द-गिर्द जीती है, उसके भीतर एक ही दिया जल रहा है और वह दिया यह है कि ज्ञान कैसे मिले? इसको ब्राह्मण....../

आज पश्चिम में जो वैज्ञानिक हैं, वे ब्राह्मण हैं. आइन्स्टीन को ब्राह्मण कहना चाहिए, लुइ पाश्चर को ब्राह्मण कहना चाहिए. आज पश्चिम में तीन सौ वर्षों में जिन लोगों ने विज्ञान के सत्य की खोज में अपनी आहुति दी है, उनको ब्राह्मण कहना चाहिए.

दूसरा वर्ग है क्षत्रिय का. उसके लिए ज्ञान नहीं है उसकी आकांक्षा का स्त्रोत, उसकी आकांक्षा का स्त्रोत शक्ति है, पावर है. व्यक्ति हैं पृथ्वी पर, जिनका सारा जीवन शक्ति ही की खोज है. जैसे नीत्से, उस ने किताब लिखी है, विल टू पावर. किताब लिखी है उसने कि जो असली नमक हैं आदमी के बीच - नीत्से कहता है - वे सभी शक्ति पाने को आतुर हैं, शक्ति के उपासक हैं, वे सब शक्ति की खोज कर रहे हैं. इसलिए नीत्से ने कहा कि मैंने श्रेष्ठतम संगीत सुने हैं, लेकिन जब सड़क पर चलते हुए सैनिकों के पैरों की आवाज और उनकी चमकती हुई संगीनें रौशनी में मुझे दिखाई पड़ती है, इतना सुन्दर संगीत मैंने कोई नहीं सुना.

ब्राह्मण को यह आदमी पागल मालूम पड़ेगा, संगीन की चमकती हुई धार में कहीं कोई संगीत होता है? कि सिपाहियों के एक साथ पड़ते हुए कदमों की चाप में कोई संगीत होता है? संगीत तो होता है कंटेम्पलेशन में, चिन्तना में, आकाश की नीचे वृक्ष के पास बैठ कर तारों के सम्बन्ध में सोचने में. संगीत तो होता है खोज में सत्य की. यह पागल है नीत्से!"              

(आगे जारी.....)
  

Saturday, February 26, 2011

Leaving Home - अरे रुक जा रे बन्दे (Indian Ocean)




For getting me introduced to Indian Ocean, I need to probably thank my job.
It was around 7-8 years back, when I was assigned to look after a visiting customer and I called him on his mobile that the soulful rendering of "Arre Ruk Ja Re Bandeh" pierced my heart like a sweet thorn of seduction.
What was this sound, I wondered? A so obviously Indian chant in the cacophony of "Indi-pop"?
It was a Delhi band "Indian Ocean", I was informed and I promptly ignored it as one freak good song from one of those innumerable tuneless bands on the circuit, which play cover versions and totally unoriginal songs with western context. I could not, however, get "Bandeh" out of my head.

And then, very recently, "Leaving Home" happened. Since then, times have not been the same.
Leaving Home, though a non-fiction film, is actually a passionate "rockumentary" about how this phenomenon called Indian Ocean was born with the confluence of life-stories of its members and crossing of their destinies and grew to finally reach the exalted perch it occupies now.
More than that, however, it is so obviously a tribute by a fan to their "forceful energy" and "their music which obviously shows no sign of dating". Listening to their music acquires a whole new meaning once you have watched this movie. It makes their passion and musical journey your very own to cherish and the satisfaction of working towards perfection your own to bask in.
Indian Ocean is probably the only truly Indian rock band with a compact (five albums) repertoire of original, soulful songs with Indian sounds. More importantly, all the songs have a context firmly placed in the Indian mindspace. All of them with gravitas and all of them very mellifluous.
Apart from hugely popular "Bandeh", there is the ancient prayer - "Kandisa"; the folk song about Narmada River - "Ma Reva"; the song of the morning - Bhor; the song about the montage called India - Des Mera, which is a part of movie Peepli Live and many more.
The band is known by its main members - Sushmit Sen, Rahul Ram, Amit Kilam and Asheem Chakravarty. Sadly, Asheem passed away in 2009 but seems has provided the band with enough of spine and inspiration which, I trust, would last them their lifetimes to continue producing good songs.
Last weekend, Indian Ocean performed in Gurgaon at a select gathering of around 250 fans, which I was fortunate to be a part of. And right from the moment Rahul struck the first chord on his guitar through the frenzied jugalbandi of Amit and Nikhil (a new member, who I do not know is permanent as of now) till the end two hours later, it was a musical treat so typical of the band - high on energy but never overboard, soulful, talking of things that matter and taking all the audience along.
As I was too busy rocking my head and swaying to their beats, I could not record anything but I have gleaned their most famous Bandeh from Youtube here below for you. If you have heard IO before, I am sure you would like it. 
If you havent yet, welcome now to the IO Fan Club.



(All pictures from the internet)

Wednesday, February 24, 2010

Sachin - The God

Being a slothful creature that I am, the sporting world doesn't excite me greatly, not even vicariously. The sports pages of my newspaper are generally skipped over and I can not dream (pun intended) of sacrificing my sleep for a game. Neither is any sport personality in my hero worship league.
But then, Sachin is no ordinary sport personality and the cricket he plays is no ordinary sport. Sachin Tendulkar is the God of cricket.
Which he has amply proved today for the nth time in his career after smashing a double ton - the first by any player in One Day Internationals so far -against South Africa in the Gwalior one-day. Which is why he remains the only sportsman I truly admire.
His cricket is of course the one thing by which we all know him but my admiration is for the level-headed, no-nonsense person he remains, in spite of his obviously exalted position in the annals of the game and in spite of the glory of immense share of our collective Indian mindscape he occupies.
This is truly a virtue in this time of excesses of all kinds, where mediocre players & personalities lose no opportunity to throw their attitude around.
Congratulations to Sachin for this achievement and congratulations to all of us that we have had this opportunity to watch him playing in our times.  

Sunday, February 07, 2010

Gandhi - our adhesive

इस बार बात देश को जोड़ने और तोड़ने की.

इसी छब्बीस जनवरी को, जब टी.वी. पर "गाँधी" फिल्म दिखाई जा रही थी, मैंने इस अद्भुत और विलक्षण व्यक्तित्व (चाहे नाट्य रूपांतर ही सही) का करिश्मा एक बार फिर देखा और महसूसा.
हमारे देश में, खासकर मेरी पीढ़ी में, गाँधी को गाली देने का और उन्हें देश की दुर्दशा के बीज बोने का जिम्मेदार ठहराने का फैशन सा है. शायद ये इस लिए है कि हम बेईमान, भ्रष्ट और सत्ता-लोलुप राजनीतिज्ञों के समय में पले बढे हैं. ऐसे में, किसी ऐसे राजनीतिज्ञ की कल्पना कर पाना, जो वाकई निस्वार्थ भाव से देश के लिए जीने और मरने की ताकत और हिम्मत रखता था, अकल्पनीय है. 
अल्बर्ट आइन्स्टीन ने गाँधी के निधन पर कहा था - Generations to come will scarce believe that such a one as this walked the earth in flesh and blood.” 
कोई आश्चर्य नहीं कि उस कठिन समय में इस आदमी ने पूरे देश से "बापू" और "महात्मा" का दर्ज़ा पाया और इसे निभाया. पूरा देश इस संत की आराधना में एक हो गया था, जुड़ गया था.

इसके उलट, छब्बीस जनवरी के बाद, फरवरी शुरू होते होते ही हमारे कुछ आधुनिक नेताओं ने राजनीतिक रोटियाँ सेकने की खातिर भारतीय जन-मानस को तोड़ने के अपने agenda को हवा दी है. 
ईकिंसवी शताब्दी में भी एक विशुद्ध कबीलाई सोच को जीवित रख कर और गरीब बेकार लोगों को क्षेत्र और भाषा के नाम पर उकसा कर  गुंडा-गर्दी मचा पाने में वो आज तक जैसे सफल हुए हैं, वो भयावह है. 

पर ख़ुशी की बात यह है कि इस बार, पहली बार यह लग रहा है कि middle-of-the-road, sensible thinking के बहुत से दावेदार उठ खड़े हुयें हैं. यहाँ तक कि घोर हिंदुत्व-वादी पार्टियां भी इनमे शामिल हैं. आशा है इस बार घृणा के बादल छंट पाएंगे और कुछ मंगलमय  होगा. 
जैसा गाँधी ने कहा था - When I despair, I remember that all through history the ways of truth and love have always won. There have been tyrants and murderers, and for a time they seem invincible, but in the end, they always fall. Think of it - always.


Friday, January 22, 2010

पुष्प की "अभिलाषा"

In the selfish times that we inhabit, people who would stand up for the larger good of the community are a rarity. Most of us lack the time, inclination and courage to think about and work for anything which lies beyond our immediate concerns. 
It therefore gives me pleasure to introduce you to Abhilasha, a dear old family friend. She has successfully spearheaded a community movement and prevented MCD (Municipal Commission of Delhi) from turning one of her colony parks into a parking lot. 
Above is a recent article in the Hindustan Times of 8th Jan'10 which applauds this effort. I apologize for the slightly tacky look of the article but because I could not blog it directly from the HT, I had to scan and put it up for you to see. I am however sure the beauty of her intent and work would more than compensate for this. 
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