Sunday, March 13, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 3 (Last)


भाग -३ (अंतिम)
वर्ण व्यवस्था पर ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) का उद्धरण  


"वर्ण का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन सम्बन्ध निर्मित हो गया. हो जाने के पीछे बहुत कारण हैं, वह मैं बात करूंगा. हो जाने के पीछे कारण थे, वैज्ञानिक ही कारण थे. सम्बन्ध नहीं था जन्म के साथ वर्ण का, इस लिए फ़्लुइडिटि थी, और कोई विश्वामित्र यहाँ से वहां हो भी जाता था. संभावना थी कि एक वर्ण से दूसरे वर्ण में यात्रा हो जाये. लेकिन जैसे ही यह सिद्धांत खयाल में आ गया और इस सिद्धांत की परम वैज्ञानिकता सिद्ध हो गयी कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण से, अपने ही स्वधर्म से ही सत्य को उपलब्ध हो सकता है, तो एक बहुत जरूरी बात पैदा हो गयी और वह यह कि यह कैसे पता चले कि कौन व्यक्ति किस वर्ण का है. अगर जन्म से तय न हो, तो शायद ऐसा भी हो सकता है कि एक आदमी जीवन भर कोशिश करे और पता ही ना लग पाए कि किस वर्ण का है; उसका क्या है झुकाव, वह क्या होने को पैदा हुआ है - पता ही कैसे चले? तो फिर सुगम यह हो सकता है कि अगर जन्म से कुछ निश्चय किया जा सके. 

लेकिन जन्म से कैसे निश्चय किया जा सके? कोई आदमी किसी के घर में पैदा हो गया, इस से तय हो जायेगा? कोई आदमी किसी के घर पैदा हो गया, ब्राह्मण के घर में, तो ब्राह्मण हो जाएगा?

जरूरी नहीं है. लेकिन बहुत संभावना है. प्रोबबिलीटी ज्यादा है. और उस प्रोबबिलीटी को बढाने के लिए, सर्टन करने के लिए बहुत से प्रयोग किये गए. बड़े से बड़ा प्रयोग यह था कि ब्राह्मण को एक सुनिश्चित जीवन व्यवस्था दी गयी, एक डिसिप्लिन दी गयी.........लेकिन दो जातियों में शादी न हो, उसका कारण बहुत दूसरा था. उसका कुल कारण इतना था कि हम प्रत्येक वर्ण को एक स्पष्ट फॉर्म, एक रूप दे देना चाहते थे....

इन चार हिस्सों में जो स्ट्राटीफिकेशन किया गया समाज का, चार हिस्सों में तोड़ दिया गया, ये चार हिस्से ऊपर-नीचे की धारणा से बहुत बाद में भरे. पहले तो एक बहुत वैज्ञानिक, एक बहुत मनोवैज्ञानिक प्रयोग था जो इनके बीच किया गया. ताकि आदमी पहचान सके कि उसके जीवन का मौलिक पैशन, उसके जीवन की मौलिक वासना क्या है......

मूल्य रुपये में नहीं होता. मूल्य व्यक्ति के वर्ण में होता है. उस से रुपये में आता है. अगर वैश्य के हाथ में रूपया आ जाए तो उस में मूल्य होता है, क्षत्रिय के हाथ में रुपये का मूल्य इतना ही होता है कि तलवार खरीद ले, इस से ज्यादा मूल्य नहीं होता, इनट्रीनसिक वैल्यू नहीं होती रुपये की क्षत्रिय के हाथ में; हाँ एक्सटर्नल वैल्यू हो सकती है कि तलवार खरीद ले.

इति.

इसी क्रम में - 

            

Saturday, March 12, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 2

भाग -२
वर्ण व्यवस्था पर ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) का उद्धरण  

"लेकिन नीत्से किसी एक वर्ग के लिए ठीक-ठीक बात कह रहा है. किसी के लिए तारों में कोई अर्थ नहीं होता. किसी के लिए एक ही अर्थ होता है, एक ही संकल्प होता है कि शक्ति और उर्जा के उपरी शिखर पर कैसे उठ जाए. उसे हमने कहा था क्षत्रिय.....

चित्र "द लास्ट मुग़ल" से  
तीसरा एक वर्ग और है, जिसको तलवार में सिर्फ भय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ेगा; संगीत तो कभी नहीं, सिर्फ भय दिखाई पड़ेगा. जिसे ज्ञान की खोज नासमझी मालूम पड़ेगी कि सरफिरों का काम है. तो तीसरा वर्ग है, जिसके लिए धन महिमा है. जिसके लिए धन ही सब कुछ है. धन के आस पास ही जिसके जीवन की सारी व्यवस्था निर्मित होती है. अगर वैसे आदमी को मोक्ष की भी बात करनी हो तो उसके लिए मोक्ष भी धन के रूप में ही दिखाई पद सकता है. अगर वह भगवान् का भी चिंतन करेगा तो भगवन को लक्ष्मीनारायण बनाये बिना नहीं रह सकता. इसमें उसका कोई कसूर नहीं है. सिर्फ फैक्ट, सिर्फ तथ्य की बात कर रहा हूँ मैं. और ऐसा आदमी छिपाए अपने को, तो व्यर्थ ही कठिनाई में पड़ेगा. अगर वह दबाये अपने आपको तो कठिनाई में पड़ेगा. उसके लिए जीवन की जो परम अनुभूति का द्वार है, वह शायद धन की खोज से ही खुलने वाला है. इस लिए और कहीं से खुलने वाला नहीं है. 

अब एक रॉकफैलेर या एक मोर्गोन या एक टाटा, ये कोई छोटे लोग नहीं हैं. कोई कारण नहीं है इनके छोटे होने का. ये अपने वर्ग में वैसे ही श्रेष्ठ हैं जैसे कोई याज्ञवल्कय, जैसे कोई पतंजलि, जैसे कोई अर्जुन अपने वर्गों में होंगे. इस में कोई तुलना, कोई कम्पेरिज़न नहीं है.

वर्ग की जो धारणा है, वह तुलनात्मक नहीं है, वह सिर्फ तथ्यात्मक है. जिस दिन वर्ण की धारणा तुलनात्मक हुई, कि कौन ऊपर और कौन नीचे, उस दिन वर्ण की वैज्ञानिकता चली गयी और वर्ण एक सामजिक अनाचार बन गया. जिस दिन वर्ण में तुलना पैदा हुई - कि क्षत्रिय ऊपर, कि ब्राह्मण ऊपर, कि वैश्य ऊपर, कि शूद्र ऊपर, कि कौन नीचे, कि कौन पीछे - जिस दिन वर्ण का शोषण किया गया, वर्ण के वैज्ञानिक सिद्धांत को जिस दिन समाजिक शोषण की आधारशिला में रखा गया, उस दिन से वर्ण की धारणा अनाचार हो गयी. 

सभी सिद्धांतों का अनाचार हो सकता है, किसी भी सिद्धांत का शोषण हो सकता है. वर्ण की धारणा का भी शोषण हुआ. और इस मुल्क में जो वर्ण की धारणा के समर्थक हैं, वे उस वर्ण की वैज्ञानिकता के समर्थक नहीं हैं. उस वर्ण के आधार पर जो शोषण खड़ा है, उस के समर्थक हैं. उसकी वजह से वे तो डूबेंगे ही, वर्ण का एक बहुत वैज्ञानिक सिद्धांत भी डूब सकता है. 

चित्र अंतरजाल से 
एक चौथा वर्ग भी है, जिसे धन से भी प्रयोजन नहीं है, शक्ति से भी अर्थ नहीं है, लेकिन जिसका जीवन कहीं बहुत गहरे में सेवा और सर्विस के आस-पास घूमता है. जो अगर अपने आप को कहीं समर्पित कर पाए और किसी की सेवा कर पाए तो फुल्फिल्मेंट को, अप्ताता को उपलब्ध हो सकता है. 

ये जो चार वर्ग हैं, इनमें कोई नीचे ऊपर नहीं हैं. ऐसे चार मोटे विभाजन हैं. और कृष्ण की पूरी साइकोलोजी, कृष्ण का पूरा मनोविज्ञान इसी बात पर खड़ा है कि प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा तक पहुँचने का जो मार्ग है, वह उसके स्वधर्म से गुजरता है. स्वधर्म का मतलब हिन्दू नहीं, मुसलमान नहीं, जैन नहीं. स्वधर्म का मतलब, उस व्यक्ति का जो वर्ण है. और वर्ण का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन सम्बन्ध निर्मित हो गया. हो जाने के पीछे बहुत कारण हैं, वह मैं बात करूंगा." 

(आगे जारी...)   

इसी क्रम में - 
      

Friday, March 11, 2011

वर्ण की वैज्ञानिकता - The Caste System Revisited (Osho) - 1

अभी किसी पत्रिका में पढ़ा कि आधुनिक भारत में दलित उत्थान के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तम्भ कांशीराम का जन्मदिन आगामी १५ मार्च को है. 
इस पर मुझे ओशो रजनीश के एक प्रवचन (गीता दर्शन, भाग-१, सोलहवां प्रवचन, सन अनुमानतः १९७० के उपरांत) के उस भाग की याद हो आयी जिस में उन्होंने वर्ण-व्यवस्था की वैज्ञानिकता पर चर्चा की है.   
जाति और वर्ण व्यवस्था के मसले पर कुछ कह पाने जितना  न तो मैं पढ़ा-लिखा हूँ, न मुझे बड़ा भारी सामाजिक अनुभव है पर यह निश्चित है कि मैं किसी भी सामाजिक अन्याय और असमता का पक्षधर नहीं हूँ.  यह भी मैं समझता हूँ कि यह एक ऐसा संवेदनशील विषय है जिस पर साधारणतया  खुल कर, बिना पूर्वाग्रहों के, निष्पक्ष बहस बहुत मुश्किल है.  पर इस सब के उपरांत इस प्रवचन के मूल भाव से मैं पूर्णतया:सहमत हूँ और इस लिए आपके साथ साझा करने की इच्छा रखता हूँ. 
आज प्रस्तुत है पहला भाग:  
          

हे अर्जुन.....
और धर्म को देख कर भी तू भय करने योग्य नहीं है,
क्यूंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़ कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य
क्षत्रिय के लिए नहीं है /(श्लोक ३१, श्री भगवद गीता) 
"कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि और सब बातें छोड़ भी दो, तो भी क्षत्रिय हो, और क्षत्रिय के लिए युद्ध से भागना श्रेयस्कर नहीं है 

इसे थोडा समझ लेना जरूरी है, कई कारणों से.
    
एक तो विगत पांच सौ वर्षों में , सभी मनुष्य सामान हैं, इसकी बात इतनी प्रचारित की गयी है कि कृष्ण की यह बात बहुत अजीब लगेगी, बहुत अजीब लगेगी, कि तुम क्षत्रिय हो. समाजवाद के जन्म के पहले, सारी पृथ्वी पर, उन सारे लोगों ने, जिन्होंने सोचा है और जीवन को जाना है, बिलकुल ही दूसरी उनकी धारणा थी. उनकी धारणा थी कि कोई भी व्यक्ति सामान नहीं है. एक.

और दूसरी धारणा उस असमानता से ही बंधी हुई थी और वह यह थी कि व्यक्तियों के टाइप हैं, व्यक्तियों के विभिन्न प्रकार हैं. बहुत मोटे में, इस देश के मनीषियों नें चार प्रकार बांटे हुए थे, वे चार वर्ण थे. 

(चित्र krishna.org से साभार)
वर्ग की धारणा भी बुरी तरह, बुरी तरह निन्दित हुई. इसलिए नहीं कि वर्ण की धारणा के पीछे कोई मनोवैज्ञानिक सत्य नहीं है, बल्कि इस लिए कि वर्ण की धारणा मानने वाले लोग अत्यंत नासमझ सिद्ध हुए. वर्ण की धारणा को प्रतिपादित जो आज लोग कर रहे हैं, अत्यंत प्रतिक्रियावादी और अवैज्ञानिक वर्ग के हैं. संग-साथ से सिद्धांत तक मुश्किल में पड़ जाते हैं... 

इन भिन्नताओं की अगर हम बहुत मोटी रूप-रेखा बांधें, तो इस मुल्क ने कृष्ण के समय तक बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य को विकसित कर लिया था और हमने चार वर्ण बांटे थे. चार वर्णों में राज है. और जहां भी कभी मनुष्यों को बांटा गया है, वह चार से कम में नहीं बांटा गया है और चार से ज्यादा में भी नहीं बांटा गया: जिन्होनें भी बांटा है - इस मुल्क में ही नहीं , इस मुल्क के बाहर भी. कुछ कारण दिखाई पड़ता है. कुछ प्राकृतिक तथ्य मालूम होता है पीछे.

ब्राह्मण से अर्थ है ऐसा व्यक्ति, जिसके प्राणों का सारा समर्पण बौद्धिक है, इंटेलेक्चुअल है. जिसके प्राणों की सारी ऊर्जा बुद्धि में रूपांतरित होती है. जिसके जीवन की सारी खोज ज्ञान की खोज है. उसे प्रेम न मिले, चलेगा; उसे धन न मिले, चलेगा; उसे पद न मिले, चलेगा; लेकिन सत्य क्या है, इस के लिए वह सब समर्पित कर सकता है. पद, धन, सुख, सब खो सकता है. बस, एक लालसा, उसके प्राणों की उर्जा एक ही लालसा के इर्द-गिर्द जीती है, उसके भीतर एक ही दिया जल रहा है और वह दिया यह है कि ज्ञान कैसे मिले? इसको ब्राह्मण....../

आज पश्चिम में जो वैज्ञानिक हैं, वे ब्राह्मण हैं. आइन्स्टीन को ब्राह्मण कहना चाहिए, लुइ पाश्चर को ब्राह्मण कहना चाहिए. आज पश्चिम में तीन सौ वर्षों में जिन लोगों ने विज्ञान के सत्य की खोज में अपनी आहुति दी है, उनको ब्राह्मण कहना चाहिए.

दूसरा वर्ग है क्षत्रिय का. उसके लिए ज्ञान नहीं है उसकी आकांक्षा का स्त्रोत, उसकी आकांक्षा का स्त्रोत शक्ति है, पावर है. व्यक्ति हैं पृथ्वी पर, जिनका सारा जीवन शक्ति ही की खोज है. जैसे नीत्से, उस ने किताब लिखी है, विल टू पावर. किताब लिखी है उसने कि जो असली नमक हैं आदमी के बीच - नीत्से कहता है - वे सभी शक्ति पाने को आतुर हैं, शक्ति के उपासक हैं, वे सब शक्ति की खोज कर रहे हैं. इसलिए नीत्से ने कहा कि मैंने श्रेष्ठतम संगीत सुने हैं, लेकिन जब सड़क पर चलते हुए सैनिकों के पैरों की आवाज और उनकी चमकती हुई संगीनें रौशनी में मुझे दिखाई पड़ती है, इतना सुन्दर संगीत मैंने कोई नहीं सुना.

ब्राह्मण को यह आदमी पागल मालूम पड़ेगा, संगीन की चमकती हुई धार में कहीं कोई संगीत होता है? कि सिपाहियों के एक साथ पड़ते हुए कदमों की चाप में कोई संगीत होता है? संगीत तो होता है कंटेम्पलेशन में, चिन्तना में, आकाश की नीचे वृक्ष के पास बैठ कर तारों के सम्बन्ध में सोचने में. संगीत तो होता है खोज में सत्य की. यह पागल है नीत्से!"              

(आगे जारी.....)
  

Wednesday, March 02, 2011

मैं सिरप लंगोटे वाला सूं.... - Tu Raja Kee Rajdulari


बोल बम.
आज महाशिवरात्रि है. यानी कि शिव-विवाह की रात्रि.


२५-२७ की उम्र तक मैं इस दिन को शिव जी की जयंती समझता था (करारे भक्त-गण माफ़ करें). फिर जब राज़ खुला तो लगा कि हाँ, इस से ज्यादा न्याय-संगत उत्सव कोई और क्या होगा?
जैसा मैं समझा हूँ, हिन्दू पुराणों के अनुसार शिव और पार्वती का समागम इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित सभी नर और नारी उर्जाओं के संगम का परिचायक है (शिवलिंग की विभिन्न व्याख्याएं आपको याद होगीं) और इसी लिए इनके विवाह को सृष्टि की निरंतरता का द्योतक भी माना गया होगा और पूजनीय भी. मुझे याद है हमारे घर-परिवारों में शिव-पार्वती विवाह एक धार्मिक कथा के रूप में कहा जाता रहा है.
इस विवाह कथा के संवाद का पहला भाग हरियाणा की एक पुरानी रागिनी के रूप में आप से बांटना चाहता हूँ, जो आप ने नए अवतार में निश्चित ही सुनी होगी - फिल्म "ओये लकी, लकी ओये" का शानदार गीत - "तू राजा की राजदुलारी". 
भक्तों के लिए थोड़ी दिक्कत यह है कि गीत का विडियो मूल फिल्म का ही है, सो भजन का फील नहीं है पर शब्दों से कहानी स्पष्ट होगी:



(विडियो यू-ट्यूब से साभार)


यह रागिनी धार्मिक से ज्यादा सामाजिक और आंचलिक परिपेक्ष्य में देखि जानी चाहिए.
पार्वती के विवाह के आग्रह पर शिव उसे विभिन्न तर्क दे कर विवाह से उन्मुख कर रहे हैं, पंक्तियाँ थोड़ी ठीक कर देने से स्पष्ट होगा -


तू राजा की राज-दुलारी, मैं सिर्फ लंगोटे वाला सूं (हूँ का हरियाणवी बोल)
भांग रगड़ के पिया करूं मैं, उंडी (कटोरा) - सोटे (दंड) वाला सूं
(शिव की वेश भूषा ध्यान कीजिये)...
 तू राजा की छोरी सै, मेरे एक भी दासी दोस्त नहीं
शाल दुशाले ओढ़न वाली, म्हारे कम्बल तक भी पास नहीं...
तू बागां की कोयल सै (है) अढे (यहाँ) बर्फ पड़े, हरी घास नहीं
किस तरयाँ (तरह) दिल लागेगा तेरा, सतरा चौ प्रकाश नहीं
किसी साहूकार के (यहाँ 'से' के अर्थ में प्रयुक्त) ब्याह करवाले, मैं खाली सोटे वाला सूं.
भांग-----
मैं धूनी तपा करूँ, तू आग देख के डर जायगी,
रंग घोल के पिया करूं, मेरा राग देख के डर जायगी
सौ सौ साल पड़े रहे जल में, तू नाग देख के डर जाएगी.
तांडव नाच करे बन में, रंग राग देख के डर जायगी
तने (तुझे) जुल्फां (ज़ुल्फ़) वाला छोरा चाहिए (यानी मोडर्न),
मैं लाम्बे (लम्बे) चोटे (जटा) वाला सूं.
भांग----


बोल बम!   

Saturday, February 26, 2011

Leaving Home - अरे रुक जा रे बन्दे (Indian Ocean)




For getting me introduced to Indian Ocean, I need to probably thank my job.
It was around 7-8 years back, when I was assigned to look after a visiting customer and I called him on his mobile that the soulful rendering of "Arre Ruk Ja Re Bandeh" pierced my heart like a sweet thorn of seduction.
What was this sound, I wondered? A so obviously Indian chant in the cacophony of "Indi-pop"?
It was a Delhi band "Indian Ocean", I was informed and I promptly ignored it as one freak good song from one of those innumerable tuneless bands on the circuit, which play cover versions and totally unoriginal songs with western context. I could not, however, get "Bandeh" out of my head.

And then, very recently, "Leaving Home" happened. Since then, times have not been the same.
Leaving Home, though a non-fiction film, is actually a passionate "rockumentary" about how this phenomenon called Indian Ocean was born with the confluence of life-stories of its members and crossing of their destinies and grew to finally reach the exalted perch it occupies now.
More than that, however, it is so obviously a tribute by a fan to their "forceful energy" and "their music which obviously shows no sign of dating". Listening to their music acquires a whole new meaning once you have watched this movie. It makes their passion and musical journey your very own to cherish and the satisfaction of working towards perfection your own to bask in.
Indian Ocean is probably the only truly Indian rock band with a compact (five albums) repertoire of original, soulful songs with Indian sounds. More importantly, all the songs have a context firmly placed in the Indian mindspace. All of them with gravitas and all of them very mellifluous.
Apart from hugely popular "Bandeh", there is the ancient prayer - "Kandisa"; the folk song about Narmada River - "Ma Reva"; the song of the morning - Bhor; the song about the montage called India - Des Mera, which is a part of movie Peepli Live and many more.
The band is known by its main members - Sushmit Sen, Rahul Ram, Amit Kilam and Asheem Chakravarty. Sadly, Asheem passed away in 2009 but seems has provided the band with enough of spine and inspiration which, I trust, would last them their lifetimes to continue producing good songs.
Last weekend, Indian Ocean performed in Gurgaon at a select gathering of around 250 fans, which I was fortunate to be a part of. And right from the moment Rahul struck the first chord on his guitar through the frenzied jugalbandi of Amit and Nikhil (a new member, who I do not know is permanent as of now) till the end two hours later, it was a musical treat so typical of the band - high on energy but never overboard, soulful, talking of things that matter and taking all the audience along.
As I was too busy rocking my head and swaying to their beats, I could not record anything but I have gleaned their most famous Bandeh from Youtube here below for you. If you have heard IO before, I am sure you would like it. 
If you havent yet, welcome now to the IO Fan Club.



(All pictures from the internet)

Friday, February 18, 2011

Letter to the Editor


Outlook recently brought out a sex-survey special issue dated 24th Jan. My take on this, published in the issue dated Feb14, 2011 is in the Letters section:


You have sadly squandered away the opportunity to seriously explore this largely virgin (pun intended) territory. Instead we have an insipid survey and compilation of inane personal accounts.
RAHUL GAUR, GURGAON

Tuesday, February 01, 2011

Red Fort - आ भाई लाल किले, लाल किले, लाल किले SSSSS!!

Continuing with the Delhi exploration theme, I was at Red Fort this last Sunday. It is surprising how we spend our whole lives moving along the peripheries and never venturing what is within our reach. As Baba Bulle Shah has said - जेड़ा घर बैठा, ओनु फडदा ई नईं (Reach out we do not, to He who resides within).
Red Fort is a magnificent palace, though a bare one now - so unlived in, so unlike the palaces of Rajasthan, which I find still warm and hospitable.
This has perhaps something to do with the fact that Red Fort has not been home to anyone since the time its last occupant - Bahadur Shah Zafar, the Last Mughal, was captured by the British after 1857.
Here are some pictures of the Red Fort and Chandni Chowk for you:          

Chandni Chowk

सब गन्दा है पर धंधा है ये 
Patel Chowk (could not resist adding this one)

The Kalpvraksh? (Outside the Chandni Chowk Metro Station)

The First Look

The Dawn of Independence, it seems?

The Entrance - Chhatta Bazaar

Love-birds
(Cliche, but so apt)

Naqqar-khana

Naqqar Khana 2

Deewan-e-aam (The Audience of the Commons)

बाहों के दरमियान 

रंग महल में कव्वे?
And then, there was light!

Bathroom Floor!

Cleaning of the Courtyard

Moti Masjid

शाही हम्माम में सभी....

मोती मस्जिद 

Temple outside Chandni Chowk Metro Station

जाने क्या 
Lets see when I get lucky next.

Tuesday, January 25, 2011

Sunday, January 23, 2011

पातळ अर पीथल


अभी जनवरी 29 को महाराणा प्रताप की पुण्य-तिथि है. 
महाराणा प्रताप की जीवनी तो मैंने कोर्स की किताबों में पढी है पर उनके देश-भक्ति के जज्बे को वाकई पढने के लिए मेरे विचार में राजस्थानी कवि कन्हैया लाल जी सेठिया की अति-लोकप्रिय वीर-रस की राजस्थानी कविता 'पातळ और पीथल" से बेहतर कुछ नहीं है.
सर्व-विदित है कि राणा प्रताप उन गिने-चुने (या शायद सिर्फ अकेले?) राजाओं में से थे जिन्होंने अकबर की दासता स्वीकार नहीं की थी और मेवाड़ को स्वतंत्र रखने के लिए जंगल-जंगल घूमना मंजूर किया था.  
इस प्रवास के दौरान एक कमजोर क्षण ऐसा आया जब अपने पुत्र अमर सिंह को रोटी के लिए बिलखते देखा तो अकबर को संधि-प्रस्ताव लिख भेजा. परन्तु अकबर के दरबार में नियुक्त कवि पीथल के प्रबल आह्वान ने उनके अन्दर के योद्धा को फिर जागृत कर डाला. कविता यही कहानी कहती है.     
बचपन में माँ के मुंह से सिर्फ सुनी इसकी पांच छः प्रमुख पंक्तियों ने मुझे कई सालों तक बांधे रखा पर बिना इन्टरनेट के उस जमाने में पूरी कविता कई सालों नहीं मिल पायी. आइये आज सम्पूर्ण कविता साझा करते हैं (आशा करता हूँ कि राजस्थानी भाषा आप समझ पाएंगे) : 


अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमरियो चीख पड्यो, राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड्यो घणो, हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैर्याँ री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदीघाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
महलां में छप्पन भोग जका, मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै, बाजोट बिनां धरता कोनी,
"अै हाय जका करता पगल्या, फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया, हिंदवाणै सूरज रा टाबर"
- आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,
पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?
जंद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवै लो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो;
म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवै लो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवै लो
म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आँख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ
नाहर री एक दकाल हुई,
हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूँ घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादल री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तलवार थकां
कुण रांड़ कवै है रजपूती ?
म्यानां रै बदळै बैर्यां री
छात्याँ में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ
उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही। 
(चित्र http://blogs.rhsmith.umd.edu/ से)

Sunday, January 16, 2011

Sunday at the Qutub

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र - दिल्ली  में रहते करीब 15 साल हो गए हैं, और इस से पहले भी तमाम बचपन यहाँ आता रहा हूँ. पर कभी कभी बड़ी  शर्म सी महसूस करता हूँ कि "जीवन की आप धापी" में यहाँ बिखरे पड़े इतिहास के अनमोल खजानों से दिली तौर पर रु-ब-रु नहीं हो पाया हूँ. इस लिए कोशिश रहती है कि इस काम को धीरे धीरे अंजाम दिया जाये.
कई दिन की ठिठुराती सर्दी के बाद जब इस रविवार पारा उठा और धूप चमकी तो अपने आपको कुतुब मीनार परिसर में पाया. इस जगह के बारे में कहने की तो कोई जरूरत ही नहीं हैं.
अपने मोबाइल कैमरे की परिमिति से मार खाते हुए भी कुछ तसवीरें आपके लिए:

 










Saturday, January 08, 2011

2011 - Resolutions, anyone?

Resolutions are just not my scene. I am brutally reminded of this every time I undergo the Happy New Year rigmarole, and see strong-willed people around me making a list - not one, not two - a whole list of resolutions!
In the true spirit of a procrastinator, I, when faced with the inevitability of such strong actions, make a wishful thinking instead, and then pray endlessly that it becomes true. So, as we move in to this new year 2011, here is a small wishlist of mine:

  1. I wish a face-to-face televised debate to be held between the maoists / naxalites and the government so that we could finally decide who are the real villains. As of now, we oscillate from being fashionably-forward types thinking in favor of the down-trodden to being politically correct and supporting the salwa-judum etc.  
  2. I wish each street of our nation could be accorded autonomy and granted a status of a federal democratic republic, which would finally put to rest the unrest over ever-increasing "regional aspirations", simply because there would be nothing more left to break free of.  
  3. I wish we could formally institutionalize the corruption in every sphere of our lives and governance. The parliament could discuss and draw up a detailed rate-list for all jobs to be done. This would make things more transparent and efficient and whats more - when India hosts the Olympics, we could concentrate on the sport without wasting our collective time on trivial moral issues.
  4. I wish the traffic police starts handing out "road-rage metres" along with the driving licenses. This would constitute a traffic-light contraption to be worn on the head by the driver, with the color indicating the person's temperature. You could at least avoid arguing with a person with a flashing red light on his head.  
  5. I wish the perpetrators of  "honor-killings' on innocent youngsters finally grow eyes in front of their faces and look forward for a change. 
  6. I wish the T20s to be progressively reduced to T10 and then possibly to T-1/6 to ensure a steady   excitement dose for cricket-crazy public and a steadier endorsement income for the cricketers. In foreseeable future, the cheerleaders could replace the players.   
  7. I wish Google search could be somehow activated in real-life (remember those sci-fi novels). Lost keys, misplaced papers etc. have started becoming a problem in advanced age.
  8. In the same manner, I wish there could be a system of affixing "Like" buttons on living people. Making friends and enemies would be so much easier, and would remove so much of duplicity from the world. 
  9. I wish a directive to be brought out to consign all the present and future infamous reality shows  to a single TV channel, which would make it awfully easy for us to avoid them like they do for tele-shopping networks. As they say, गलती से भी गलती ना हो.
  10. In a similar manner, I sincerely wish there is a separate radio FM channel for the ever-increasing property / real estate / builder ads. I know housing is a good economic indicator but I simply can not bear to hear anymore of those irritatingly well-modulated voices exhorting me to drool at some "dream-property" at some undreamed-of locations.           
  11. I wish the TV news-channels could take out some time to show only tickers on their screens - maybe a warp and waft design or some other, so that in the remaining time they do not torment us with multiple news tickers at the bottom of the screen which are completely undecipherable. 
  12. I wish each honored member of the Gen-Y (or is it Z now?) is made to attend a compulsory coaching on "How to speak Hindi in Hindi".   
  13. I wish being 'sexy' includes being fat and bald - in this year and ahead. 
Do let me know if you can add to this list.

Saturday, December 25, 2010

छल्ला - Chhalla by Rabbi Shergill


पंजाबी गीतों से हम में से अधिकतर लोगों का परिचय धिन्चक किस्म के चलताऊ गीतों से ही हुआ है, जबकि पंजाबी गीतों और साहित्य का बहुत गहरा और शानदार खजाना है.
हाल में चल रहे फिल्म "क्रूक" के एक लोकप्रिय गाने "छल्ला" को इन्टरनेट पर ढूँढ़ते हुए मुझे रब्बी शेरगिल का गाया "छल्ला" नाम का ही एक बेहद खूबसूरत गीत मिला है जो मैं आपके लिए लगा रहा हूँ.
रब्बी की युवा और संजीदा आवाज में एक कशिश है, जो आपने उनके पुराने गानों जैसे "बुल्ला, की जाणा" और "तेरे बिन" जैसे गानों में भी याद होगी.
गीत का भाव कुछ यूँ है कि एक विरहणी अपने प्रियतम की याद में उसके भेंट किये गए छल्ले (angoothi) से ही दिल की बातें कर रही है. 
गीत का मजा लीजिये:



रब्बी शेरगिल की वेबसाइट से चुन कर इस गीत का अंग्रेजी रूपांतर भी लगा रहा हूँ:



English Translation:
 The ring it listens to no one 
The ring it listens only to my mom
It will leave only if she tell it to
Listen my love
Don’t know who’s done this voodoo

The ring it lies on the well
Let’s talk face to face
Listen my love
Don’t you wanna see me sometime 
It’s hard for me not to see you         

The ring a borewell’s water
Where has my love drifted to
I have no news
Listen my love
On your berry has grown a thorn

The ring unripe mangoes
Someone give me sage advices
Let’s commit to contemplation
What’s left of time yours and mine
Listen my love
Or our lives will go waste

The ring a long braid
I kissed it in my dream
The desire had gone blind
But I listened to my heart
Listen my love
Now punish me as you will

The ring a lone banyan
He holds on to the
Earth below and God above
Listen my love
How far run his roots
He knows not himself

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